दिल्ली की अधिकांश फैक्ट्रियों मे ताले मे बंद कर करवाया जाता है काम..नही होती है श्रम विभाग द्वारा कार्यवाही

आर.के.जैन,एडिटर इन चीफ

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दिल्ली मे झिलमिल के इंडस्ट्रीयल क्षेत्र घटी दर्दनाक घटना पर विशेष….नई दिल्ली, शनिवार 13 जौलाई को झिलमिल शाहदरा के औद्योगिक क्षेत्र में हुयी दर्दनाक घटना में 3 कर्मचारियों की मौत की घटना कोई पहली या आखिरी घटना नही है दिल्ली की फैक्टरियों मे ऐसे हादसे होना आम बात है, जिसका जिम्मेदार पूर्ण रूप से दिल्ली का श्रमविभाग जिम्मेदार है। दिल्ली की सभी फैक्ट्री मालिक अपनी फैक्टरी मे श्रमिकों से 12 घंटे काम लेते हैं। श्रमिकों को फैक्ट्री के दमघोंटू वातावरण में 12 घंटे के लिए बंद करके बाहर से ताला डालकर मालिक बाहर घुमते हैं, इन फैक्ट्रियों मे प्लास्टिक का सामान, तांबे के एंव प्लास्टिक के तारों,पीतल एंव रासायनिक पदार्थ तैयार करने का काम किया जाता है इसलिए इन फैक्ट्रियों का वातावरण दमघोंटू होता है, इन फैक्ट्रियों मे आग बुझाने, आक्स्मिक घटना से निपटने एंव बाहर निकलने का इंतजाम न होना, शुद्ध वातावरण रखने का इंतजाम न होना, फैक्टरी मे आवश्यकता से अधिक सामान भरने, कबाड़ भरा रहने एंव कम जगह मे अधिक श्रमिक रखने आदि के कारण ऐसी घटनाएं होती हैं। फैक्ट्री मालिकों द्वारा श्रमिकों का कर्मचारी बीमा (ईएसआई) भी नही कराया जाता है। किसी श्रमिक के साथ फैक्ट्री मे कोई हादसा होने पर फैक्ट्री मालिक श्रम विभाग से साठगांठ करके तत्काल पिछली तारीखों मे उसका ईएसआई करा देते हैं। फैक्ट्री मालिक अपनी अधिक कमाई के चक्कर मे अक्सर श्रमिकों के जीवन से खिलवाड़ करतें हैं। श्रमिकों को श्रमविभाग के नियमानुसार पारिश्रमिक भी नही दिया जाता है ऐसा नही है कि फैक्ट्री मालिकों की इन करतूतों की जानकारी श्रमविभाग को नही है बल्कि यह कहना उचित होगा कि ये सब श्रमविभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से ही फैक्ट्री मालिक ऐसा बेखौफ होकर कर रहे हैं। श्रमविभाग को फैक्ट्री मालिकों की यूनियन द्वारा प्रतिमाह एक निश्चित धनराशि समय पर पहुंच जाती है जिसके कारण श्रमविभाग आंख मूंदकर बैठा है, यही नही इन फैक्ट्रियों मे उत्पादित सामान भी अधिकांश कच्ची पर्चीयों पर बेचकर बिक्री कर एंव आयकर की चोरी कर सरकार को चूना लगाया जाता है इसमे भी आयकर एंव बिक्रीकर के अधिकारियों की मिलीभगत होती है। कच्ची पर्चीयों पर ज्यादातर लेन देन तांबा और पीतल के कारोबारियों के यहाँ ज्यादातर होता है। जब तक श्रमविभाग को फैक्ट्री मालिकों से ऐसे ही होली दिवाली मिलती रहेगी तब तक दिल्ली का श्रमिक ऐसे ही मरता रहेगा।

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