महिला सर्वोपरि शक्ति है , हर कार्य में है महिला का विशेष योगदान

रामदेव सजनाणी/की लाइन टाइम्स संवाददाता
आऊ।

स्त्री होना भी कहाँ आसान है, बहुत से प्रतिबंधों, अभावों, प्रताड़नाओं, संकटों और चुनौतियों से होकर गुजरना पड़ता है। नारी कमजोर नहीं होती और ना ही कमजोरी लिए हुए जन्म लेती है बल्कि जन्मोपरांत पुरुषवादी समाज उसे कमजोर बना देता है। जिस हालात में एक लड़की अथवा स्त्री जीवनयापन करती है, शायद ही कोई लड़का अथवा पुरुष वैसा जीवन जी पाये।
आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे आ रही है। खेल जगत, अंतरिक्ष क्षेत्र, राजनीतिक हिस्सेदारी, सामाजिक सरोकार, प्रशासनिक सेवा, सैन्य बल, उद्योग-व्यापार, परिवहन विभाग आदि हर क्षेत्र में महिलाएं अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही है। इन सब के बावजूद कई हजारों-हजार महिलाएं चाहरदीवारी की लक्ष्मण रेखा में ही सीमित रह जाती है। स्त्री की सुरक्षा चारदीवारी में ही नहीं बल्कि उससे बाहर निकलने में है। आज जरूरत प्रताड़ित महिलाओं की आवाज बनने की है। मात्र शिक्षा से ही यह परिवर्तन संभव है। पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ी है। आज हर माँ-बाप अपनी बेटी को शिक्षित करना चाहते है ताकि आत्मनिर्भर बन सके। कक्षा 12वीं तक ग्रामीण क्षेत्र में ही पढ़े, जब वक्त आया उच्च शिक्षा का, तब पिताजी ने आज्ञा दे दी कि आपकी इच्छा और आपका निर्णय सर्वोपरि है, मेरा सहयोग सदा साथ रहेगा, अपनी राह खुद तय करे। घर वालों की तरफ तो तय ही था कि जयपुर पढ़ने जाना है, जब आस-पड़ोस को पता चला कि उच्च शिक्षा के लिए दोनों भाई-बहिन जयपुर गमन कर रहे है, तब काफी लोगों ने बड़े ताज्जुब से पूछा कि, ” क्या सुंदर भी जयपुर पढ़ने जाएगी ?”……अब भी काफी लोग बड़े आश्चर्य से पूछते है कि, “यार सिर्फ ग्रेजुएशन करने के लिए जयपुर जाने की कहां आवश्यकता थी ?” कई बार ऐसे सवालों के उत्तर न देना ही बेहतर होता है।
गांवो में कोई लड़की या महिला गाड़ी-बाइक चलती दिख जाती है तो लोग बड़े आश्चर्यजनक तरीके से देखते है जैसे कि गाड़ी-बाइक चलाने का ठेका पुरुषों ने ही ले रखा हो। काफी संत-महात्माएँ लड़कियों के पास मोबाइल न रखने और जीन्स न पहनने पर ज्ञान देते रहते है। महावारी और गर्भावस्था में स्त्रियों को हिकारत की दृष्टि से देखा जाता है। रूमा देवी, बाड़मेर ने KBC ( कौन बनेगा करोड़पति ) कार्यक्रम में घूंघट प्रथा पर अपने विचार रखे थे, वैसे यह एक कुप्रथा ही है। कट्टर पुरुषवादी इसके लिए भी रूमा देवी का आलोचना करने लगे थे।
आज से कुछ वर्षों पूर्व सोशल मीडिया का ज्यादा क्रेज नहीं था। रूढ़िवादी सोच ने महिलाओं के प्रति संकीर्ण मानसिकता बना रखी है। यदि पुरुष अपनी माँ-बहिन-पत्नी और महिला दोस्त के साथ फोटो शेयर करता है तो कोई गलत बात नहीं है। अब भी कई लोग फोटो शेयर करने से बचते है, इसकी वजह भी स्पष्ट है- लोगों की तुच्छ सोच और मानसिकता।
बहुत से कानूनी प्रावधानों और सवैधानिक सुरक्षा के बावजूद भी धरातलीय वास्तविकता भिन्न है। महिला सशक्तिकरण की पहल सार्थक है। नारी घर को आबाद भी हो सकता है और नष्ट भी। ‘अबला’ शब्द महिला का पर्यायवाची शब्द है, मगर अब महिलाएं अबला नहीं सबला है। स्त्रियों पर आभूषणों और कपड़ों का बोझ लाद दिया जाता है, इतने से ही स्त्रियां खुद को धन्य समझती है। एक पतिव्रता स्त्री अपने पति की हर बात को कर्तव्य समझती है।
आज तक जितनी भी कविताओं और साहित्यों की रचना हुई है, उनमें मुख्य स्त्री ही है और सम्बोधन भी स्त्री को किया गया है। स्त्री जब प्रेम में होती है, अपना सर्वस्व न्योछावर कर देती है। वो प्यार माँ का हो, बहिन का हो या भले ही पत्नी का हो। आप और हम ज्यादा कुछ न सही मगर एक स्त्री को सम्मान तो दे ही सकते है। एक लड़की अपने प्रेमी को भूल सकती है मगर इज्जत देने वाले को कभी नहीं। स्त्री जितनी भावुक होती है, उतनी कठोर भी होती है।
हिम्मत है पुरुष की स्त्री। पुरुष को जीना सिखाती है स्त्री। जब-जब मुसीबतें आकर खड़ी होती है, पुरुष के साथ खड़ी नजर आती है स्त्री। घर की खुशियों की चाबी है स्त्री। पुरूष की इज्जत है स्त्री। विश्वास और स्नेह की मूरत है स्त्री। प्यार का अथाह सागर है स्त्री। प्रस्तुत अंश अनिल खिलेरी द्वारा प्रतिपादित है।

आइए जानते हैं महिलाओं के विचार-
प्राचीन काल से ही महिलाएँ पर्यावरण-संरक्षण के प्रति जागरुक रही हैं,पर्यावरण सरंक्षण में महिलाओं का योगदान अतुल्य है । विश्नोई जाति की महिलाओं ने न केवल पेड़ों की सुरक्षा की, बल्कि एक इतिहास रच डाला, जो आज भी महिलाओं के लिये प्रेरणा का काम करता है और आज भी पहाड़ों पर महिलाएँ यही प्रक्रिया अपना कर पेड़ों को बचाने में लगी हैं ।
राजेश्वरी विश्नोई

आज़ादी के बाद परिस्थितियां बदलने के साथ ही साहित्य और लेखन में महिलाओं के स्वर और विषयों में भी बदलाव दिखने लगा । नारी मुक्ति की भावना और अभिव्यक्ति ज्यादा मुखर रूप से उभर कर सामने आयी । महिलाओं का अपनी पारम्परिक छवि को तोड़कर एक नए रूप में दिखना पुरुषों के लिए अचम्भे से कम नहीं था ।
उषा गोदारा
P. hD स्कॉलर
बिश्नोई समाज का समाज शास्त्रीय अध्य्यन

मेरी शुरुआत से पढ़ाई में रुचि रही है और साथ में खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में नियमित हिस्सा लेती रही हूँ। दो बार जिला स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिता, जालोर के 17 वर्गीय छात्रा वर्ग में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी रही हूँ। मैं शिक्षिका बनना चाहता हूँ और आने वाली सभी बहिनों के लिए एक राह प्रदान करना चाहता हूँ।
सुंदर भादू, साँचोर, एक विद्यार्थी

शिक्षा और महिला ससक्तिकरण के बिना परिवार, समाज और देश का विकास नहीं हो सकता । महिला यह जानती है की उसे कब और किस तरह से मुसीबतों से निपटना है । जरुरत है तो बस उसके सपनों को आजादी देने की ।
डॉ. मोनिका भादू संगरिया

आज से कुछ बरस पहले तक मीडिया में अँगुलियों पर गिनी जाने वाली महिलाएँ थीं । लेकिन आज स्थिति भिन्न है । आज मीडिया-जगत का ऐसा कोई कोना नहीं जहाँ महिलाएँ आत्मविश्वास और दक्षता से मोर्चा नहीं संभाल रही हो । विगत वर्षों में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और इंटरनेट पत्रकारिता की दुनिया में महिला स्वर प्रखरता से उभरें है ।
सरिता अनिल बिश्नोई जैसला

कथा-साहित्य में भी स्त्री चेतना ने अपनी उपस्थिति पूरी गहराई और शिद्दत से दर्ज करवाई है पर हिन्दी साहित्य में तथाकथित स्त्री विमर्श और विचार इतने बौद्धिक स्तर पर है कि आम औरतों तक या उन औरतों तक, जिन्हें सचमुच जागरूक बनाने की जरूरत है, यह पहुँच ही नहीं पाता । यह काम साहित्य के स्त्री विमर्शकारों से कहीं अधिक महिला संगठन और जमीनी तौर पर उनसे जुड़ी कार्यकर्ता कर रही हैं ।
सुनीता खीचड़ गृहणी
बावरला हाल नागपुर

समाज के विकास के लिए यह बेहद जरुरी है की लड़कियों को शिक्षा में किसी तरह की कमी न आने दे क्योंकि उन्हें ही आने वाले समय में लड़कों के साथ समाज को एक नई दिशा देनी है । ब्रिघम यंग की बात को अगर सच माना जाए तो उस हिसाब से अगर कोई आदमी शिक्षित होगा तो वह सिर्फ अपना विकास कर पायेगा पर वहीं अगर कोई महिला सही शिक्षा हासिल करती है तो वह अपने साथ साथ पूरे समाज को बदलने की ताकत रखती है ।
शोभा बुड़िया
फिटकासनी,जोधपुर

महिलाएं परिवार बनाती है, परिवार घर बनाता है, घर समाज बनाता है और समाज ही देश बनाता है । इसका सीधा सीधा अर्थ यही है की महिला का योगदान हर जगह है । महिला की क्षमता को नज़रअंदाज करके समाज की कल्पना करना व्यर्थ है ।
सुमित्रा बिश्नोई
LDC सतलाना, लुणी

वह कौन-सा क्षेत्र है जहाँ नारी कार्यरत नहीं है । आकाश की ऊँचाइयों में प्रगति के पर फैला नारी आश्चर्यजनक उड़ान भरने लगी है । हमें उस पर गर्व है, पर प्रगति का अर्थ अपनी परंपरा, मर्यादा तथा संस्कृति को भूलना नहीं है ।
विजयलक्ष्मी बिश्नोई
श्रीगंगानगर

इतिहास गवाह है कि भारत की महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं । चाहे स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी की बात हो, कला का क्षेत्र हो, साहित्य का क्षेत्र हो, समाज सेवा का क्षेत्र हो अथवा साहसिक कारनामों का क्षेत्र हो । भारत की महिलाएँ सदैव पुरुषों से आगे रही हैं ।
भंवरी कालीराणा छीतेर बेरा भोजासर

महिलाओ को भी कम नही समझना चाहिये। कल्पना चावला जो अन्तरिक्ष पर जा सकती और सामाजिक सेवा कार्य के महिला आजनकी तारिख में सबसे आगे है। वो चाहे समाज सेवा कार्य हो या राजनीतिक कार्य या खेलकूद कार्य या शिक्षा जगत हो। विज्ञान जगत में या देश सेवा के बॉर्डर हो हर जगह बहने सबसे आगे रहती है।
ममता दवे ,युवा भारत सांचोर

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