कोरोना वायरस की त्राही से आमजन के खाने की थाली से हरी सब्जियां गायब, मरूस्थल के मेवे केर, कूमटीया, सांगरी, काचर ने ली जगह

मालाराम जाणी जिला रिपोर्टर /जोधपुर

वर्तमान में कोरोना वायरस जैसी महामारी की विकट समस्याओं से जूझ रहे सम्पूर्ण विश्व जगत के साथ साथ भारत राष्ट्र भी इस त्रासदी से लड़ रहा है। इस समय सम्पूर्ण भारत में 24 मार्च 2020 को रात्री कालीन से 21 दिन का lock down के सरकारी निर्देश दिये गये हैं। जो आगामी 14 अप्रैल तक के आदेश जारी है। इस कोरोना वायरस की महामारी जैसी घातक बिमारी के चलते आम लोग तो क्या बड़े बड़े अमीरो के घर की थालीयो से खाने में ग्रीन सलादे, फल-फ्रूट ओर तरह तरह की हरी सब्जियों का मेल गायब नजर आ रहा हैं। क्युकि एक तो त्रासदी कोराना वायरस की, तो दूसरी समस्या लोक डाऊन के कारण घरो से सब्जियों के बाजार तक जाने की परेशानी तो है ही, साथ में बाजार में आने वाली हरी सब्जियों के बढते महंगे दाम तथा कोराना संक्रमण का डर, ओर घर में लाने के बाद उन सब्जियों व फल-फ्रूट हरी सलादो की सामग्रियों को सेनेटराईजन करना जैसी मुसीबते ओर भी दिखत पैदा करती है। दूसरा इस त्रासदी में सब्जी विक्रेताओं द्दारा सब्जियों को लम्बै समय तक तरोताजा दिखाने के लिए रंगो व कैमिकल्स आदी का भी उपयोग कर रहे हैं। जो खतरनाक बीमारीया पैदा कर सकते हैं। लोगो को सब्जी बाज़ार में डेली ताजा सब्जीया व फल फ्रूट उपलब्ध नहीं होने पर लोगों ने हरी सब्जियां घरों में लाना ही बंद कर दिया है।
ऐसी विकट समस्याओं मे राजस्थानी देशी सब्जियां हर गरीब – अमीर, शहर – गाँव के घर में ग्रहणीयों की रसोईघर में देखने को मिल रहा है। राजस्थानी ग्रहणी की प्रसिद्ध देशी सब्जियों में केर, सांगरी, कूमटीया, काचर – काचरी, ग्वार फली, मोढफली, मैथी, टींडसी सूखी सब्जियों के साथ साथ कढी़ रायता, राबोडी़ हर आमजन के खाने की थाली मे शुद्ध देशी सब्जी के रुप में वंयजन स्वरुपी देखने को मिल रही है। इन सब्जियों में न तो कीटनाशक दवाओं के उपयोग का डर हैं और न ही किसी बिमारी फैलने का। यह सब्जीया ज्यादातर मौसमी वर्षा कालीन समय में पानी से या मरूस्थल के इन फलदार कुछ पेडो़ से ऋतु वार प्राप्त सुखाई गई सब्जीया है। जो पूराने समय में राजस्थानी घरो की रसाईयों की आन शान होती थी। केर-सांगरी-कूमटीया, काचरी-काचर पंचकूटा का सूखे मेवै तो रसोईघर की सब्जी में वाह वाही के चार चांद लगा देता है। केर, सांगरी, कुमटीया तो एक तरह सूखे मूवो की शोगात माना जाता है। जो पोरानिक समय में राजस्थानी वासी अपने घर आये मेहमानो के लिए खाने में इन सब्जियों का इस्तेमाल करके “अतिथि देवो भव” की परम्परा का निर्वाह करने मे बेखूबी सफल होते थे। यह सब्जीया राजस्थान में शाही सब्जी की प्रतिष्ठा पा चूकी है। राजस्थान मे प्रकृति द्दारा उपलब्ध कराई गई इन सब्जियों की सौगातों की बदोलत राजस्थान की ग्रहणीयां अपने घरो की रसाईयों से इन सब्जियों के व्यंजनौ से अतिथी सत्कार की परम्परा निभाने व अपने घर में स्वाद्दिष्ट व स्वास्थ्य वर्धक सब्जियां उपलब्ध कराने मे पहले भी सफल रही हैं। ओर आज इस कोराना महामारी जैसै हालत मे भी इन सब्जियों ने एक बार से ग्रहणीयों को संजीवनी प्रदान की है। इनकी महीमा एक कहावत राजस्थानी काव्य “हठीलो राजस्थान” में है –


“सट रस भोजन सीत में, पाचण राखै खैर। पान नही पर कल्पतरू, किण विध भुलाँ कैर।।


कैर कुमटीया सांगरी, काचर बोर मतीरा तीनूं लोकां नह मिलै, तरसे देव अखीर।

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