05 जून “विश्व पर्यावरण दिवस” पर बिशेष।

विश्व पर्यावरण दिवस 2020: जैव-विविधता और कोरोना महामारी।

ANIL KUMAR SONI / COORDINATOR BIHAR ✍️

बिहार : BIHAR हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है. विश्व पर्यावरण दिवस को मनाए जाने के पीछे उद्देश्य है पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरुकता फैलाना. पहली बार संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन 1972 में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। 5 जून 1974 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया। विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की शुरुआत स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुई। यहां 1972 में पहली बार पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया गया था जिसमें 119 देशों ने भाग लिया था।

आज लगभग 46 वर्षों बाद भी इस दिवस को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। 

साल 2020 में ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ का मुख्य विषय ‘जैव-विविधता’ है। जैव-विविधता का अर्थ पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं से जोड़ा जाता है। जव-विविधता के संदर्भ में साल 2020 अत्यंत विशेष है।

जहां एक ओर साल 2020 को इतिहास में कोरोना महामारी के लिए याद रखा जाएगा, वहीं दूसरी ओर सोशल-मीडिया पर साझा होती ‘जीवों और प्राकृतिक दृश्यों की तस्वीरें भी 2020 को हमारे मस्तिष्क से कभी उतरने न देंगी। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कोरोना संकट का इस साल जैव-विविधता पर क्या असर पड़ा है।

कोरोना-वायरस के चक्र को रोकने के लिए विश्व के अधिकतर देशों ने तालाबंदी करने का फैसला लिया है। तालाबंदी के अंतर्गत नागरिकों को घर पर ही रहने के आदेश दिए गए हैं। साथ ही वाहन और कारखानों पर भी रोक लगाई गई है। इन नियमों के कारण विश्व के अनेक देशों में प्रदूषण स्तर की निरंतर कमी देखी जा रही है।

चीन में जनवरी से ही कार्बन उत्सर्जन में 25% कमी देखी गई है। अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में कार्बन मोनो-ऑक्साइड की मात्र 2019 की तुलना इस साल में आधी पाई गई है। भारत की राजधानी दिल्ली में तालाबंदी के बाद वायु प्रदूषण स्तर 49% कम पाया गया है।

प्रदूषण में कमी होने का असर पूर्ण रूप से जैव-विविधता पर पड़ रहा है। सोशल-मीडिया पर वायरल होती प्राकृतिक तस्वीरें साफ़ दर्शाती हैं कि मनुष्य के हस्तक्षेप  न होने के कारण आज अनेक जानवर वनों के बाहर भी घूम पा रहे हैं। साथ ही साफ़ आसमान में दुर्लभ चिड़ियाओं की मधुर ध्वनि और स्वच्छ निर्मल नदियों में डॉल्फिन प्रजाति भी देखने को मिली है।

तालाबंदी के दौरान मनुष्य सुन्दर मनोरम प्राकृतिक नज़रों का भरपूर आनंद ले रहे हैं। इससे यह साफ़ होता है की साल 2020 ने मानव और प्रकृति के बीच एक टूटी ड़ोर को जोड़ा है।

जैव-विविधता तथा प्राकृतिक दृष्टि से 2020 की सकरात्मक शुरुआत तो हुई, परन्तु जैव-विविधता पर आज अनेक संकट मंडरा रहे हैं, जो अत्यंत चिंताजनक हैं। कोरोना महामारी के दौरान हर देश का पूरा ध्यान सिर्फ महामारी समाप्त करने पर रहा है। ऐसे में वनों में गैर-क़ानूनी शिकार की गतिविधियों में बढ़ोतरी देखी जा रही है।

भारत के असम स्थित काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में तालाबंदी के एक हफ्ते के भीतर ही 10 शिकार के मामले सामने आए थे। इसी तरह, राजस्थान में तालाबंदी के 33 दिन में 10 शिकार की घटनाएं दर्ज की गई थी।

संकटग्रस्त प्रजाति जैसे चिंकारा, भारतीय गैण्डा आदि के अत्यधिक शिकार से उन जीवों के विलुप्त होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

कोरोना-वायरस संक्रमण से बचने के लिए हुई तालाबंदी का पर्यटन पर नकारात्मक असर पड़ा है। आज अंतर्राष्ट्रीय विमानों पर रोक है, जिससे पर्यटन में गिरावट आई है। साथ ही कोरोना संक्रमण के भय से खुद भी लोग दूर आने-जाने में कतरा रहे हैं। थाईलैंड जैसे देश पर यह एक गंभीर संकट की घड़ी है, क्योंकि उनकी अर्थव्यवस्था पर्यटन पर ही टिकी होती है।

आज स्थिति यह है कि वहां पर्यटकों के मनोरंजन में योगदान देने वाले पालतूू हाथी भूख से तड़प रहे हैं। आर्थिक मंदी के कारण उन हाथियों को लेकर लोग 100 किलोमीटर से भी ज्यादा का सफ़र तय कर वापस गांंव जा रहे है। उन्हें उम्मीद है कि वे दूर गाँव में खेती से हाथियों का पेट भर पाएंगे। भारत में भी हाथी पालने वाले समुदाय आर्थिक मंदी से ग्रस्त है और हाथियों के लिए लगातार सहायता की गुजारिश कर रहे हैं।

पर्यटन की कमी से हाथियों के अलावा अनेक जीव जैसे बन्दर, कुत्ते आदि भी भूख की समस्या से पीड़ित हैं। कहा जा सकता है कि कोरोना संकट से प्रभावित पर्यटन का जैव-विविधता पर कुछ हद तक नकारात्मक असर भी पड़ा है। कोरोना संकट का असर देशों की आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है।

इस साल देशों की प्राथमिकता कोरोना संकट से जुडी आर्थिक मंदी कम करना है। ऐसे में देखा जा रहा है की अनेक देशों ने वन्य-जीव संरक्षण परियोजना और पर्यावरण बजट में कटौती करी है।

अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया राज्य में सरकार ने जल-वायु परिवर्तन के बजट को कम करने का प्रस्ताव रखा है। भारत का महाराष्ट्र राज्य कोरोना से अत्यधिक पीड़ित है।

ऐसे में महाराष्ट्र ने प्रोजेक्ट बाघ परियोजना का बजट, 60.5 करोड़ से कम करके 50 करोड़ करने का फैसला किया है। वनों पर निर्भर समुदायों के विकास हेतु बनी डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी जन वन परियोजना के अंतर्गत 75 करोड़ को कम करके 10 करोड़ देना का निर्णय किया है।

इस साल वन्य-जीव संरक्षण परियोजनों के बजट में कटौती होने से जैव-विविधता से जुड़े संरक्षण कार्यों में रुकावटें आना भी संभव है।
 
कोरोना महामारी के साथ-साथ अनेक प्राकृतिक आपदाएं भी देखने को मिल रही हैं, जो जैव-विविधता पर अपना प्रभाव डाल रही हैं। इस साल कार्बन उत्सर्जन के कारण बढ़ रहे जल-वायु परिवर्तन का विकट रूप भी जैव-विविधता पर देखने को मिला। बदलते तापमान से समुद्री चक्रवातों में वृद्धि हुई है। कोरोना महामारी से जूझ रहे बंगाल को चक्रवात अम्फान का भी सामना करना पड़ा।

इस चक्रवात ने बंगाल के क्षेत्रों में 5000 वृक्षों को जड़ समेत उखाड़ दिया। बंगाल के सुंदरबन वन को बाघों के आवास का एहम क्षेत्र माना जाता है।

चक्रवात अम्फान ने सुंदरबन स्थित एक तिहाई मैन्ग्रोव वनों को भी नुकसान पहुंचाया है, जिससे बाघों की जान को भी खतरा हो रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जल-वायु परिवर्तन के कारण बढ़ते चक्रवातों से टिड्डी नमक कीड़े की जनसंंख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई है। 

टिड्डी कीड़ों ने राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रेश आदि राज्यों के खेतों में अपना आक्रमण कर लिया है। ये कीड़े कृषि पौधों को खा कर जैव-विविधता को कम कर देते हैं। साथ ही टिड्डी आक्रमण के कारण हुए अनाज के अभाव में देश को भुखमरी जैसी स्थिति से भी गुजरना पड़़ सकता है।

जय-विविधता के महत्व को समझते हुए, इस ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ पर हमें यह प्रण लेना है की हम जैव-विविधता बढाने और प्राकृतिक संतुलन हेतु पूर्ण प्रयास करेंगे।

कोरोना के दौर में पर्यावरण पर पड़ने वाले अच्छे प्रभावों से हम सीख लेंगे कि प्रकृति और मानव के बीच एक अनमोल बंधन है और उसे हम हमेशा सहज कर रखेंगे। घटते प्रदूषण के आंकड़ो को प्रयोग कर सरकार को भी ठोस पर्यावरण नीति बनाने की पहल करनी चाहिए।

कोरोना संकट समाप्त होने के बाद, आने वाले समय में आर्थिक गति को बल देने के साथ-साथ हमें पर्यावरण सुधारने के दिशा में भी गहन चिंतन करना होगा। आइए, पृथ्वी को हमेशा के लिए उतना सुन्दर बना दें कि हमें बार-बार प्राकृतिक नज़रों को कैमरे में कैद करने की ज़रूरत ही न पड़े। हमेशा के लिए चिड़ियों की मधुर आवाज़ हमें सुने देती रहे, साफ़ वायु में हम सांस ले पाएं और जीवों को भी पृथ्वी पर रहने का उनका अधिकार दे सकें।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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