बच्चों के हर ज़िद को पूरा न करें ! जाने क्या ? हैं नुकसान।

बच्चों का दिमाग़ कोरे कागज के जैसे होते हैं।

ANIL KUMAR SONI / COORDINATOR BIHAR ✍️

मां-बाप, भाई-बहन, घर के दूसरे सदस्य, रिश्तेदार, पड़ोसी, दोस्त और समाज सबके असर से धीरे-धीरे बच्चे समाज में जीना सीखते हैं। इन सभी में मां-बाप का सहयोग सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आमतौर पर बच्चे शुरुआती दिनों में सबसे ज्यादा समय मां-बाप के साथ गुजारते हैं। इसलिए उनके मन, मस्तिष्क, स्वभाव और व्यवहार पर सबसे ज्यादा असर भी मां-बाप का ही पड़ता है। लेकिन कई बार अंजाने में मां-बाप कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं, जिससे बच्चों का मस्तिष्क कमजोर होता जाता है और उन्हें जीवन में आगे कई तरह की चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आइए आपको बताते हैं क्यां हैं वे गलतियां।

बच्चों की हर ज़िद को पूरा करना।

बिहार : (Bihar) हर मां-बाप अपने बच्चे को प्यार करते हैं। वो चाहते हैं कि अपने बच्चे को वो सारी खुशियां दें, जो वो डिमांड करते हैं। लेकिन मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जिन बच्चों की बचपन से हर तरह की इच्छा पूरी की जाती है, उनका व्यवहारिक विकास अच्छी तरह नहीं हो पाता है। व्यवहारिक विकास की हम सभी के जीवन में बड़ी भूमिका है। कुछ मौकों पर मां-बाप के द्वारा बच्चों की इच्छा को ठुकराना और उन्हें गलत-सही समझाना उनके जीवन में अनुशासन लाता है। इसलिए बच्चों की हर ज़िद को पूरी करने के पीछे न भागें, पहले इस बात का विश्लेषण करें कि बच्चे को उस चीज की उस समय विशेष पर कितनी जरूरत है और आप उसे दिलाने में कितने सक्षम हैं, तभी उसकी इच्छा पूरी करें।

बच्चों को समय न देना।

ये एक ऐसी गलती है, जिसका असर बहुत बाद में देखने को मिलता है। अगर मां-बाप इतने बिजी रहते हैं कि बच्चों को भी समय नहीं दे सकते हैं, तो इससे भी बच्चे के मानसिक विकास और सामाजिक विकास पर असर पड़ता है। बच्चों को बिल्कुल आजाद कर देना और बिल्कुल नजर न रखने से बच्चे अपने मन की तो करते ही हैं, साथ ही कई बार कुछ गलत करने पर मां-बाप से छिपाते और झूठ भी बोलते हैं। इसलिए बच्चों को थोड़ा समय जरूर दें। उनसे बात करें, उनके दिन के बारे में पूछें, उनके दोस्तों की जानकारी रखें। कुल मिलाकर उन्हें इस बात का एहसास दिलाएं कि उनके पीछे उनकी निगरानी के लिए आप हमेशा साथ हैं। इससे कम साहसी बच्चों में हिम्मत भी बढ़ती है।

बच्चों को बहुत अधिक बंधनों में रखना।

कुछ मां-बाप बच्चों के बिगड़ने के डर से उन्हें बचपन से ही बहुत अधिक बंधन में रखते हैं। बच्चों पर थोड़ा-बहुत अंकुश जरूरी है क्योंकि उनका मन चंचल होता है और उन्हें अपने सही-गलत की समझ नहीं होती है, लेकिन बहुत अधिक बंधनों में रखने से बच्चे का मानसिक विकास ठीक से नहीं हो पाता है। ऐसे मां-बाप अक्सर समझते हैं कि पढ़ाई-लिखाई के द्वारा ही बच्चा जीवन में सफल हो सकता है। मगर सच्चाई ये है कि एकेडमिक ज्ञान के अलावा व्यवहारिक ज्ञान और सामाजिकता भी जीवन में सफलता में बड़ी भूमिका निभाती है। इसलिए बच्चों को बहुत अधिक बंधनों में रखना गलत है।

बच्चों को मारना और डांटना।

कुछ मां-बाप बच्चों को सुधारने के लिए मानसिक और शारीरिक हिंसा को ही सबसे अच्छा रास्ता मानते हैं। बच्चों को मारने और डांटने से उनके डिप्रेशन में जाने, विरोधी मानसिकता के पनपने और मां-बाप के प्रति गलत नजरिया बनने की स्थितियां हो सकती हैं। इसके कारण बच्चा न तो मानसिक रूप से स्थिर हो पाता है और न ही पढ़ाई-लिखाई में ठीक से मन लगा पाता है। इसलिए बच्चों को डांटने और मारने से कहीं ज्यादा बेहतर उपाय है उन्हें शांत दिमाग से बिठाकर समझाना और उनका भरोसा जीतना।

बच्चों से बहुत अधिक उम्मीद करना।

हर मां-बाप की अपने बच्चे से कुछ न कुछ उम्मीदें होती हैं। कई बार बच्चे उन उम्मीदों पर खरा उतरते हैं, तो कई बार वो उम्मीदें पूरी नहीं कर पाते हैं। ऐसे में अगर मां-बाप बच्चों पर किसी खास काम के लिए लगातार मानसिक दबाव बनाएं, तो ये भी एक तरह की मानसिक प्रताड़ना ही है। इससे बच्चे का मस्तिष्क ठीक तरह से विकसित भी नहीं हो पाता है और स्थिर भी नहीं रहता है। इससे बच्चे की सीखने की क्षमता भी प्रभावित होती है। इसलिए बच्चों से उम्मीद रखें, उन्हें इसे प्राप्त करने के लिए प्रेरित भी करें, लेकिन मानसिक दबाव न बनाएं।

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