दीपक यादव एक उधोगपति से राजनीतिक सफर पर एक नज़र !

डॉ. नृपेंद्र कुमार पाण्डेय✍️

बिहार : पश्चिम चम्पारण की मिट्टी में कुछ तो खाश विशेषताएँ रही ही है , जिसके महक की गुड़गान सतयुग से लेकर आज कलयुग तक है।

फोटो : भाजपा नेता दीपक यादव


जहाँ चम्पा जैसे सुगंधित पुष्प होते हो, जहाँ ब्रिटिश के जमाने में नील की खेती होती हो, जहां महात्मा गांधी ने सत्याग्रह जैसे आंदोलन की शुरुआत की हो, अब और गहराई में जाये तो सतयुग में श्री राम से जुड़ी बहुत सारी विशेषताएँ इन चंपारण के मिट्टी से जुड़ी है ।
करीब नव छोटे-बड़े उधोग के मालिक दीपक यादव ने उन सभी जगहों को छोड़कर चम्पारण से अपने राजनीति कैरियर की शुरुआत की है।
एक मुलाकात के दौरान श्री यादव से राजनीति कैरियर के तरफ रुख करने पर मेरा एक सवाल बना।
कि अचानक आपने राजनीति में आने की योजना कैसे बनाई , आखिर आपके मन में क्या आया, और आपने चम्पारण जगह ही क्यों चुना।

दीपक यादव ने बताया कि पहले हम चम्पारण के बारे में बहुत सारी बिशेषताये सुने थे, मेरा जब चम्पारण के भूमि पर आने का सैभाग्य प्राप्त हुआ , तब यहां के हाव – भाव , रहन- सहन, भेष- भूषा से धीरे-धीरे अवगत हुए । यहां आने के क्रम में हमने देखा कि यहां के लोग आज भी झोपड़ पट्टी में रह रहे है। गरीबी उसी तरह यथावत बनी हुई है। यहाँ आज़ादी के बाद बहुत लोगो को जन प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला होगा, लेकिन इतने दिनों के अंतराल में विकास के जगह केवल अभाव ही अभाव दिखाई दिया।

एक-एक करके बहुत लोग मेरे संपर्क में आते गए, सभी के बातों को ध्यान पूर्वक सुनते हुए, आखिर हमने योजना बनाई की चम्पारण को विकास के राह पर लाकर ही रहूंगा।
यहां केवल पैसों के लिए ही राजनीति हुई है विकास कुछ हुआ ही नही।

यहाँ सिस्टम के नाम कुछ भी नही, सब शून्य है। तब हमने विचार बनाया की इस चम्पारण को एक सुंदर चम्पारण बनाने में हमे जितनी भी मेहनत करनी होगी हम दिलों जान से मेहनत करेंगे। लोगो के बीच स्वमं जाएंगे। सब से मिलेंगे और हर क्षेत्र के समस्या से भली भांति अवगत होंगे। और एक सिस्टम बनाएंगे।

मुझे पैसों के लिए राजनीति नही करना , मुझे सिस्टम और विकास के लिए राजनीति करना है , मुझे गरीबी मिटाने के लिए, चम्पारण को सुंदर बनाने के लिए , करप्शन मिटाने के लिए राजनीति करना है। जो लोग पैसों के लिए राजनीति में आये वो अगल लोग है।

इतिहास के पन्ने उलाटकर अगर कोई देखना चाहे तो देख सकता है। हम तो जब से चंपारण आये है सब देख ही रहे है। आम जनता जैसे कल जी रही थी वैसे आज भी जी रही है। कोई परिवर्तन नही हुआ है । उदाहरण स्वरूप कोरोना काल में कोई भी राजनीतिक पार्टी उन गरीब परिवार का हाल खबर लेने उनके दरवाजों तक नही पहुंचा । सम्पूर्ण लॉक डाउन में गरीब मजबूर लाचार परिवार को भोजन की समस्या पैदा हो गई। मेरे संज्ञान में उनलोगों की समस्या आने के बाद हमने राहत सामग्री वितरण उसी दिन से उनके दरवाजों तक पहुचाना शुरू किया और आगे भी निरंतर जारी रहेगा। वही कई क्षेत्र में बाढ़ के तबाही के चलते लोग काफी परेशान दिखे उन लोगो को भी राहत सामग्री देते हुए बिहार सरकार के सामने उनके समस्या को फोटो और वीडियो क्लिप के माध्यम से रखते हुए सरकार से आग्रह किया ।

नतीजा चंपारण को बाढ़ इलाका घोषित करते हुए 6-6 हज़ार रुपये सहायता राशि देने का अस्वासन मिला। साथ ही मवेशियों के जान माल के लिए भी अतरिक्त राशि देने को तय हुआ।
कोई परिवार भूखा न सोये स्लोगन के साथ उन सभी बुझने के कगार पर चूल्हे को बुझने से बचाया। ये मेरा एक छोटा सा प्रयास है अभी बहुत कुछ जनकल्याण के लिये करना है, क्षेत्र के विकास के लिए करना है।

कोई परिवार भूखा न सोये स्लोगन के साथ आज सौ दिन पूरे हो गए है।

Share this news:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *