संयम का तात्पर्य है चारित्र – आचार्य महाश्रमण… Surendra munot, Associate Editor All India, Key Line Times

संयम का तात्पर्य है चारित्र – आचार्य महाश्रमण

पूज्यप्रवर ने किया संयम के प्रकारों का वर्णन

27 जुलाई 2021, मंगलवार, आदित्य विहार, तेरापंथ नगर, भीलवाड़ा, राजस्थान

शांतिदूत आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में जैन आगम ठाणं पर आधारित अमृतमय देशना से श्रावक-श्राविकाओं को अध्यात्म का नव आलोक मिल रहा है। आचार्यप्रवर द्वारा प्रतिपादित तत्वज्ञान की व्याख्याओं से जन-जन लाभान्वित हो रहा है।

धर्म देशना देते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा- संयम का तात्पर्य है चारित्र। सर्व चारित्र साधु में होता है और श्रावक में देश चारित्र विद्यमान होता है। चारित्र के पांच प्रकार बताए गए है- सामायिक, सूक्ष्म संपराय, छेदोपस्थानीय, यथाख्यात, परिहार विशुद्धि चारित्र। अंश रूप से आरंभ -समारंभ से निवृत होने वाला देशव्रती श्रावक कहलाता है और पांचों चारित्र का पूर्णरूपेण पालन करने वाला साधु कहलाता है। उपरोक्त चार चारित्र सामायिक चारित्र के ही विशिष्ट रूप है। आचार गुण संबंधी भिन्नता के कारण इन्हें भिन्न श्रेणी में रखा गया है। साधु की सामायिक में सर्व सावद्ययोग का त्याग होता है परंतु श्रावक के सर्व सावद्य योग का त्याग प्रत्यक्ष रूप से हो सकता है पर अप्रत्यक्ष रूप से नही हो सकता इसलिए साधु का त्याग बड़ा होता है।

आचार्यवर ने आगे फरमाया कि शास्त्रकारों ने अलग-अलग व्याख्या करके सयंम की विवेचना की है। संयम चारित्र के दो मूल भेद है – सराग संयम, वीतराग संयम। सराग संयम में आयुष्य का बंध हो सकता है, वीतराग संयम में फिर आयुष्य का बंध नही होता है।

तत्पश्चात आचार्य प्रवर ने तेरापंथ धर्मसंघ के षष्टम आचार्य श्री माणक गणी का जीवन वृत “माणक महिमा” का संगान किया।

नमनकर्ता..R.k.jain, Editor in chief, Key Line Times

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