तेरापंथ धर्म संघ की अष्टम असाधारण साध्वी प्रमुखा पचास वर्षों से कर रहीं हैं नारी चेतना को जागृत करने का कार्य…सुरेंद्र मुनोत, ऐसोसिएट एडिटर आल इंडिया, Key Line Times

‘‘लेखिका तेरापंथ धर्म संघ की अष्टम् असाधारण साध्वी प्रमुखा हैं जो गत पचास वर्षों से नारी चेतना को जागृत करने का अद्भुत कार्य कर रही हैं। उनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन भरे मार्गदर्शन में तेरापंथ महिला समाज ने अभूतपूर्व प्रगति की है। महिला समाज अपने संस्कारों और संस्कृति को अक्षुण्ण रखते हुए विकास पथ पर अग्रसर हो इसके लिए वे अहर्निश प्रयासरत हैं।’’

विश्वग्रासी संकट और महावीर का दर्शन
साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा

हर युग का इतिहास उस युग में घटित होने वाली परिस्थितियों के आधार पर लिखा जाता है। हर व्यक्ति जिसमें चिन्तन की क्षमता है और जो व्यापक दृष्टिकोण रखता है, अपने युग की समस्याओं को समाहित करने के लिए प्रयत्नशील रहता है, क्योंकि वे समस्याएं उसके वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक या राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित करती हैं। जो व्यक्ति दूरगामी चिन्तन के धनी होते हैं, उनकी प्रज्ञा शाश्वत समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती है। भगवान महावीर एक ऐसे ही महापुरुष थे जिन्होंने वर्तमान विश्व चेतना के स्वरूप को आज से ढाई हजार वर्ष पहले ही आंक लिया था। अपने सुदूरवर्ती अंकन के फलस्वरूप उन्होंने जो तत्त्व दिया वह टूटती हुई विश्व-चेतना के लिए सशक्त आलम्बन है।
आज विश्व की सबसे बड़ी समस्या है-आकांक्षाओं का विस्तार और वस्तुओं का अभाव। यह समस्या केवल भारत की ही नहीं है। वर्तमान दुभिक्ष की संभावना ने विश्व-व्यवस्था का सन्तुलन तोड़ना प्रारम्भ कर दिया है। अनावृष्टि या अतिवृष्टि जैसी प्राकृतिक विवशताएं वास्तव में जटिल समस्याएं हैं। किन्तु इससे भी बड़ी एक समस्या है मनस्तृप्ति का प्रयास। मनुष्य जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति अनिवार्य रूप से करणीय कार्य है और वह किया भी जा सकता है। किन्तु इच्छाओं की पूर्ति का सपना साकार हो, सम्भव नहीं लगता।
अन्नाभाव की समस्या को आज बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है, क्या वास्तव में अन्न का अभाव है या अभाव के गीत केवल असमर्थ लोगों के लिए हैं? अन्न भण्डारों में अन्न होता ही नहीं तो हर वर्ग अभाव से पीड़ित होता। किन्तु एक ओर मनुहारोंपूर्वक भोजन और दूसरी ओर भूखे शयन। यह द्विरूपता सबसे बड़ी समस्या है और इसका कारण है अन्न का गलत संग्रह। अन्न-भण्डार जिनके अधिकार में है वे उनसे अतिरिक्त धन पाने की कामना संजोए हुए हैं। बाजार में वस्तुएं आती हैं, लोगों को इसकी सूचना मिलते ही वे दौड़कर आते हैं किन्तु वे तब तक कहीं से कहीं चली जाती हैं। जिन लोगों के पास अर्थ अधिक है वे मुंह-मांगे मोल देकर वस्तुएं खरीदते हैं। उनके परिवारों को यह अनुभव नहीं होता कि देश में किस वस्तु की कमी है और उनके उपयोग में कितनी सावधानी रखनी चाहिए।
इस समस्या के समाधान में भगवान महावीर ने असंग्रह का दर्शन दिया। उनकी दृष्टि से वे दोनों व्यक्ति दोषी हैं जो अधिक मूल्य में वस्तु बेचते या खरीदते हैं। उनके अर्थ और वस्तु का संग्रह दूसरे व्यक्तियों के सुख का बाधक है। यह तथ्य उसके ध्यान में नहीं रहता। संग्रहशील व्यक्ति अर्थार्जन की प्रक्रिया में शोषण और अप्रामाणिकता के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है। संचय की आसक्ति जिसमें नहीं होती वह सामाजिक स्तर पर भी किसी प्रकार का शोषण नहीं कर सकता।
संग्रह का मनोभाव मनुष्य-मन की दुर्बलता है। वह इसे विवशता के रूप में स्वीकार करता है। मन की शक्ति प्रबल हो तो विवशता का प्रभाव क्षीण हो जाता है। मन दुर्बल होता है। तब वह उस प्रभाव से दब जाता है। इसके साथ अर्थ के प्रति मन की आसक्ति का योग होता है, विलासी जीवन जीने की चाह जागृत होती है। व्यक्ति जैसे-तैसे संग्रह करने में जुट जाता है। प्रारम्भ में वह अर्थ की आवश्यकता से प्रेरित होकर अर्थ का अर्जन करता है। अर्जन के साथ अर्थ-सम्वर्धन की कामना उसे सुविधावाद की ओर अग्रसर करती है। व्यक्ति के तीव्र प्रयत्नों से अर्थ का संवर्धन होता है। इससे वह अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद कुछ-न-कुछ बचाने लगता है। बचा हुआ अर्थ एक सीमा तक पहुंचकर उसकी निधि बन जाता है। अब वह उसमें अत्यन्त आसक्त हो जाता है तथा दिन-रात उसके संवर्धन और संरक्षण की चिन्ता में घुलता रहता है।
साध्वी प्रमुखाश्री कनकप्रभाजी के अमृत महोत्सव पर अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल द्वारा प्रदत आलेख।

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