सत्ता के लिए महाभारत काल एंव वर्तमान स्थिति में सत्ता संघर्ष पर विशेष

संपादकीय

आर.के.जैन

मुख्य संवाददाता

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सत्ता के लिए द्वापरयुगीय में हुये महाभारत और सत्ता के लिए हो रहे वर्तमान कलियुगी चुनावी महाभारत पर विशेष-

साथियों
सत्ता पर कब्जा करने के लिए द्वापर युग में एक राजनैतिक महाभारत कौरवों और पांडवों के बीच हुई थी जिसमें सारे नैतिक मूल्य को तार-तार कर दिया गया था और महाभारत जीतने के लिए सारे राजनीतिक एवं कूटनीतिक दांव छल प्रपंच लगा दिए गए थे। इस महाभारत में एक तरफ अनीत अन्याय पर चलने वाले दुर्योधन थे तो दूसरी तरफ न्याय धर्म की राह पर चलने वाले युधिष्ठिर थे और भगवान श्री कृष्ण दोनों के खास थे लेकिन एक को उनकी सेना पसंद थी जबकि दूसरे को वह खुद श्री कृष्ण पसंद थे। यही कारण था कि महाभारत के शुरुआती दौर में श्री कृष्ण नहीं चाहते थे कि इन दोनों भाइयों के मध्य सत्ता के लिए ऐतिहासिक महायुद्ध हो इसीलिए इसे टालने के लिए वह मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रयास कर रहे थे लेकिन दुर्योधन ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया परिणाम स्वरूप सत्ता के लिए ऐसा अकल्पनीय महाभारत हुआ जो इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया और आज भी उसकी याद की जाती है। द्वापर युग के बाद सत्ता पर कब्जा करने के लिए दूसरा राजनैतिक महाभारत महायुद्ध आजकल लोकसभा चुनाव के रूप में हो रहा है जिसमें एक तरफ तो सत्ता पर पुनः कब्जा करने के लिए सत्ताधारी दल भाजपा एवं उसके सहयोगी तो दूसरी तरफ विपक्षी दल कुरुक्षेत्र में आमने सामने खड़े चुनावी महाभारत कर रहे हैं। जिस तरह द्वापर में हुए महाभारत में सत्ता के लिए हुए धर्म युद्ध में सारे नियम कानून सिद्धांतों की बलि दे दी गई थी और महाभारत जीतना लक्ष्य हो गया था उसी तरह इस समय हो रहे राजनीतिक महाभारत में सारे लोकतांत्रिक मूल्यों सिद्धांतों परंपराओं को ताक पर रखकर एक दूसरे पर शब्दों के बाण चलाकर चुनावी महाभारत पर फतह करना मुख्य लक्ष्य बन गया हैं जिसे देख कर देश दुनिया की नहीं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के करोड़ों मतदाता हस्तप्रभ एवं अचंभित हैं।मैं इससे पहले भी कह चुका हूं कि इस बार 2019 के हो रहे लोकसभा चुनाव अपने आप में ऐतहासिक अभूतपूर्व महाभारत की तरह अविस्मरणीय है जिसमें वसूलों सिद्धांतों नैतिक मूल्य़ों एवं लोकतांत्रिक मान मर्यादाओं का कोई महत्व नहीं रह गया है और लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार तार कर सत्ता हथियाने के प्रयास किये जा रहे है। यह पहला अवसर है जबकि भारत में हो रहे इस लोकतांत्रिक महापर्व के महाभारत में चुनावी मुद्दे एवं चुनावी परिदृश्य गिरगिट की तरह रोजाना रंग बदलते जा रहे हैं। इस बार हो रहे लोकसभा चुनावों की महाभारत की शुरुआत पुलवामा हमले के बाद भारतीय सेना के शौर्य प्रदर्शन एवं राफेल विमान खरीद में चौकीदार चोर से हुई थी और अली बजरंगबली इस महाभारत के मुद्दे बन गए थे लेकिन ज्यौं ज्यौं यह चुनाव अपनी अंतिम दौर की तरफ बढ़ रहा है त्यों त्यों इसका स्वरूप और राजनीति शब्द बाणों का रूप महाभारत की ही तरह बदलता जा रहा है। चुनाव के अंतिम दौर में द्वापर युग में हुए महाभारत दुर्योधन अर्जुन और श्री कृष्ण भगवान को भी शामिल कर लिया गया है तथा जाने माने राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता के सहारे यह राजनीतिक चुनावी महाभारत पर विजय हासिल करने के प्रयास शुरू हो गए हैं। इस बार हो रहे लोकतंत्र के चुनावी की महाभारत में सत्तादल की चुनावी नाव के खेवनहार प्रधानमंत्री मोदी को दुर्योधन और मुख्य विपक्षी की भूमिका निभाने वाली कांग्रेस अपने को श्रीकृष्ण बताकर सत्ता तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। इस समय हो रहे लोकसभा चुनाव मैं जहां गांधी परिवार के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को असली चोर भ्रष्टाचारी परिवार वादी बताया जा रहा है तो वहीं कांग्रेस महाभारत के श्री कृष्ण की तरह दुर्योधन को समझाने जाने पर उन्हें बंदी बनाने की कोशिश करने का प्रयास करने की तुलना सत्ता दल के मोदी से की जा रही है। इस कलयुगी महाभारत में दुर्योधन कौन है पांच पांडव कौन है और श्रीकृष्ण की भूमिका कौन निभा रहा है इसका फैसला मतदाता भगवान कर रहे हैं और आगामी 23 मई को मतगणना के बाद ही पता चलेगा कि मतदाता भगवान किसे दुर्योधन और किसे अर्जुन एवं श्रीकृष्ण साबित करता है। लेकिन इतना तो तय हो गया है कि द्वापर में सत्ता के लिए हुये ऐतहासिक महाभारत की तरह यह चुनाव भी ऐतहासिक बनता जा रहा है।

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