साहिबाबाद : मकान बचाने के लिए अब सुप्रीकोर्ट का दरवाजा खटखटायेंगे के अर्थला के लोग

साहिबाबाद। अर्थला झील की जमीन पर बने मकानों को खोने का डर वहां रहने वाले लोगों में बढ़ता जा रहा है। अपने आशियाने को लेकर लोग काफी चिंतित हैं। उच्च न्यायालय से याचिका खारिज होने के बाद अब लोगों ने सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है। इसको लेकर लोगों ने बैठक की है।
उच्च न्यायालय से याचिका खारिज होने तथा बृहस्पतिवार को मकान ध्वस्त होने के बाद स्थानीय लोगों में चिंता बढ़ गई है। लोगों को अपना मकान खोने का डर सता रहा है। अपने आशियाने को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहते हैं। वहीं प्रशासन ने भी साफ कर दिया है कि एनजीटी का पालन करते हुए जमीन को खाली कराने को लेकर नियमित अंतराल पर अभियान चलाया जाएगा। ऐसे में लोगों को अपना मकान बचता नजर नहीं आ रहा है।


अपने मकान को बचाने के लिए बृहस्पतिवार को नगर निगम और जिला प्रशासन की कार्रवाई के बाद रात को स्थानीय लोगों ने बैठक की। बैठक में लोगों ने सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है। जल्द ही सुप्रीम कोर्ट जाकर याचिका दायर करने की तैयारी तेज हो गई है।

डूडा या सूडा के तहत मकान देने की बनाई जा रही योजना
प्रशासन ने साफ किया है कि एनजीटी के आदेश के अनुपालन में अवैध निर्माण ध्वस्त करने के लिए अब लगातार नियमित अंतराल पर अभियान चलाया जाएगा। योजना बनाई जा रही है कि जिनके मकान तोड़े जाएं उनमें जरूरतमंद लोगों को डूडा या सूडा के तहत नि:शुल्क आवास भी मुहैया कराए जाएं। हालांकि अभी कोई भी मानक प्रशासन की तरफ से तय नहीं किए गए हैं। माना जा रहा है कि उन लोगों को मकान दिया जाएगा जिनके पास रहने का कोई दूसरा ठिकाना नहीं है। एक परिवार को एक ही भवन दिया जाएगा। एडीएम सिटी शैलेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि झील की जमीन पर हुए सभी अवैध निर्माण ध्वस्त होने हैं। नियमित अंतराल पर अभियान चलाकर निर्माण ध्वस्त किए जाएंगे। जरूरतमंद बेघरों को आवास भी मुहैया कराया जाएगा।

खुले में पेड़ के नीचे गुजारी रात

बालाजी विहार में बृहस्पतिवार को जिन लोगों ने अपने मकान गंवाए उन्होंने खुले आसमान के नीचे रात गुजारी। अपना मकान खोए निखत ने बताया कि प्रशासन की तरफ से कोई मदद नहीं की गई है। उन्होंने अपने परिवार के साथ पेड़ के नीचे रात गुजारी। आस पड़ोस के लोगों ने उनके लिए खाने की व्यवस्था की। उनका कहना है कि जमापूंजी जोड़कर मकान बनाया था वह भी उजड़ गया है। उनके पास अब इतने भी रुपये नहीं हैं कि कहीं झोपड़ी भी डाल सकें।

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