अनुभवशाली व्यक्तित्व की अनदेखी, बेमेल की हुयी टुटती दोस्ती पर विशेष संपादकीय… अवश्य पढें।

आर.के.जैन,एडिटर इन चीफ

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अनुभवशाली व्यक्तित्व की अनदेखी,रास्ते की बेमल दोस्ती और ध्वस्त महागठबंधन पर
✒ विशेष सम्पादकीय✒

कहावत है कि-” बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय काम बिगाड़े आपनो जग में हुयै हसाय”। इसी तरह कहा जाता है कि घर परिवार अथवा देश को चलाने के लिए युवाओं की शक्ति के साथ बुजुर्गों के तजुर्बे का भी बड़ा महत्व होता है और जब बुजुर्गों के तजुर्बे को अनदेखा कर दिया जाता है तो उसके परिणाम अच्छे शुभ कर नहीं होते हैं। इसी तरह मित्रता के बारे में भी कहा गया है कि वह हमेशा समान विचारधारा में अगर होती है तो टिकाऊ एवं लंबे समय तक चलने वाली फलदायक होती है लेकिन जब मित्रता क्षणिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए होती है तो मित्रता स्वार्थ पूर्ति होते ही क्षण भर में टूट कर चकनाचूर हो जाती है। पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान सपा बसपा रालोदा में हुई मित्रता एक राह पर चल रहे दो राहगीरों की मित्रता जैसी थी जो एक ही मंजिल के मुसाफिर थे और जब मंजिल नहीं मिली तो दोनों पुनः अलग अलग रास्ते के अकेले मुसाफिर हो गए। लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा को परास्त कर रसातल में पहुंचाने के उद्देश्य बनाया गया महागठबंधन एक ही मंजिल के दो राहगीरों की क्षणिक दोस्ती जैसा था जो गठबंधन बनने के बाद से ही चर्चा का विषय बना हुआ है और जैसी आशंका की जा रही थी आज वही दृश्य सामने आ गया है। सभी जानते हैं कि सपा और बसपा भले ही एक ही मंजिल के दो मुसाफिर रहे हो लेकिन दोनों के चलने के तरीके एवं रीति रिवाज एक दूसरे से विपरीत अलग अलग थे। इतना ही नहीं सभी जानते हैं कि दोनों एक दूसरे के राजनीतिक विरोधी ही नहीं बल्कि एक दूसरे की जानी दुश्मन जैसे थे और स्वप्न में भी एक दूसरे को फूटी आंख देखना तक पसंद नहीं करते थे। इसके बावजूद चुनावी मंजिल को आसान करके सत्ता तक पहुंचने के लिए दोनों एक साथ चलने के लिए तैयार हो गए थे। सभी जानते हैं कि समाजवादी पार्टी को गठित करके मुलायम सिंह ने अपने खून पसीने से सींच कर उसे राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया है जबकि बसपा का गठन मान्यवर कांशीराम ने जातीय गणित के आधार पर किया था और बाद में बहन मायावती जी को अपने साथ हमराही बनाकर राजनीति की शुरुआत की थी। यह भी सभी जानते हैं कि बसपा को अगर शुरुआती दौर में प्रतिष्ठित राजनीतिक दलों का संरक्षण नहीं मिलता तो वह सरकार बनाकर अपने राजनीतिक स्वरूप का विस्तार नहीं कर पाती। राजनीतिक दृष्टिकोण से अगर देखा जाए तो सपा की बसपा से बराबरी नहीं की जा सकती है। यही कारण था कि रातोरात बने बनाए सपा रूपी घर के मालिक बने अखिलेश यादव को उनके पिता राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी मुलायम सिंह यादव ने बसपा से गठबंधन करने से रोका था और अपने दम पर चुनाव लड़ने की राय दी थी लेकिन उस समय शायद यह बात अखिलेश यादव की समझ में नहीं आई थी और पिता की इच्छा के विपरीत अपनों को नजरअंदाज करके बसपा की गोदी में बैठ गए थे।भाजपा नेता एवं प्रधानमंत्री मोदी चुनाव प्रचार के दौरान ही कह रहे थे की सत्ता प्राप्ति के लिए वसूलो सिद्धांतों को ताक पर रखकर बनाया गया गठबंधन मतगणना के बाद टूट कर चकनाचूर हो जाएगा और वही हुआ भी। मतगणना के बाद चुनाव परिणाम आते ही दोनों के रास्ते अलग-अलग हो गए और महागठबंधन हमेशा हमेशा के लिए टूटकर बिखर गया। गठबंधन करने की पहल भले ही सपा ने की थी लेकिन तोड़ने की पहल सपा ने नहीं बल्कि बसपा ने की जो लोकसभा चुनाव में सपा के सहारे जीरो से हीरो बन गई। सपा बसपा के साथ हाथ मिलाकर चलने और राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पैर छूने के कारण हीरो से जीरो हो गई। आजकल सपा बसपा की दोस्ती दुश्मनी में तब्दील होकर अपनी अपनी राह पर अलग अलग चलने की घोषणा आम चर्चा का विषय बनी हुई है।आमलोगों का मानना है कि इस महागठबंधन से सबसे ज्यादा क्षति सपा को हुयी है और यदि गठबंधन नही होता तो शायद सपा की यह दुर्दशा नहीं होती क्योंकि सपा सरकार के समय में हुये तमाम कार्य आज भी जनता में प्रासंगिक बने हुए हैं।

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