पशु शिविर से पहले ही बीच रास्ते में डाला चारा

शिविर स्थल पर ना चारा पहुंचा ना ट्रैक्टर

लोग भरकर ले गए कट्टे व बोरिया

गणेश जैन फलसुंड जैसलमेर

फलसूण्ड. सरकारी धनराशि व योजनाओं की किस तरह दुरुपयोग होता है, इसकी बानगी बुधवार शाम ग्राम पंचायत मानासर में देखने को मिला। पशु शिविर में लाए गए चारे को एक किमी पहले ही बीच सडक़ पर डाल दिया गया। पशु शिविर स्थल तक न तो चारा पहुंचा, न ही ट्रैक्टर। गौरतलब है कि गत वर्ष जिले में बारिश के अभाव में क्षेत्र में भीषण अकाल की स्थिति बनी हुई है। इसी को लेकर पशुओं को राहत दिलाने के लिए सरकार की ओर से पशु शिविर शुरू किए गए है, लेकिन संस्थाओं की ओर से पशुओं की बजाय ग्रामीणों को चारा बांटने का खेल चल रहा है।

ग्राम पंचायत मानासर में एक संस्था की ओर सेे पशु शिविर का संचालन किया जा रहा है। हालांकि मौके पर पशु शिविर चल रहा है और शिविर में पशु भी है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर यहां कुछ भी नहीं है। बुधवार की शाम पशुओं के लिए यहां चारा पहुंचा। एक ट्रैक्टर में आए चारे को चालक की ओर से शिविर से एक किमी पहले ही झाल को खोल दिया गया। एक किमी सडक़ पर पूरा चारा बिखर गया। ऐसे में पशु शिविर तक चारे का एक दाना भी नहीं पहुंचा।
लोग भरकर ले गए कट्टे व बोरियां
ट्रैक्टर को आता देख बड़ी संख्या में ग्रामीण सडक़ पर आ गए। ट्रैक्टर चालक की ओर से ट्रोली को ऊंचा करते ही झाल खुल गई और चारा सडक़ पर बिखरना शुरू हुआ। इतने में ग्रामीणों में होड़-सी मच गई। पुरुष, महिलाएं व बच्चे चारे को बीनने लगे। उन्होंने कट्टों व बोरियों में चारा भर लिया और घर ले जाकर संग्रहित कर रख दिया, ताकि अपने पशुओं को खिला सके।
मुंह ताकते व मार खाते रहे पशु
जब ट्रैक्टर ट्रोली को ऊंचा किया गया। इस दौरान किसी ने पशु शिविर के दरवाजे को भी खोल दिया। ऐसे में चारा देखकर शिविर में जमा पशु भी सडक़ पर आ गए और चारा खाने लगे। इस दौरान यहां खड़ी भीड़ ने पशुओं को भगाने का भी प्रयास किया। चप्पलों, हाथों व लाठियों से पशुओं को मारकर व हकाल कर ग्रामीणों ने चारा एकत्र किया। ऐसे में जिन आवारा पशुओं के लिए चारा पहुंचा था, वे मुंह ताकते ही नजर आए।
बड़े सवाल – क्या रोज चलता है यही खेल ?
ग्राम पंचायत मानासर में चारे से भरा एक ट्रैक्टर आता है और सडक़ पर ही चारा उड़ेल दिया जाता है। इस बीच ग्रामीण भी मौके पर आ जाते है और चारा एकत्र करते है। जिसका वीडियो भी पत्रिका के पास है। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या रोज यही खेल चलता है? पशुओं के लिए आने वाला चारे को ग्र्रामीणों में ही बांटा जाता है? तो पशु शिविर में जमा किए गए पशुओं को आहार में क्या दिया जाता है? इन बड़े सवालों के बावजूद न तो प्रशासन की ओर से इस ओर कोई ध्यान दिया जा रहा है, न ही कोई कार्रवाई हो रही है। ऐसे में सरकारी धनराशि का खुलेआम दुरुपयोग होता नजर आ रहा है।

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